सूर्य की पहली किरण🌄

काली धुंध को मिटाती हुई,
रजनी के अंधकार को छुपाती हुई,
नव पल्लव,कलियों को जगाती हुई,
आशाओं का एक दिया लिये हुए,
सूर्य की पहली किरण,🌞
नव उमंगों को हर्षाती हुई।

ओस की बूंदों को विदा कर,
रजत हरियाली से सजा कर,
पंक्षियों को नीड़ से जगा कर,
फूलों की मुस्कान लिए हुए,
सूर्य की पहली किरण 🌞
थकी नींद सी अंगड़ाती हुई।

नई उम्मीदों सी, आशाओं सी,
कल,आज और कल की परिभाषा सी,
मंगल की उम्मीद,पावन अभिलाषा सी,
मानव मन की उड़ान लिए हुए,
सूर्य की पहली किरण, 🌞
नव वधु सी इठलाती हुई।

“तेरी मेरी दोस्ती”

# friendship

कहीं एक तारा टूटा होगा,
किसी ने धागा बंधा होगा जा कर मज़ार
पीपल की पूजा की होगी या
दुआओं के लिए हाथ उठे होंगे हजार,
तब जाकर एक रिश्ता बना – दोस्ती
तेरी मेरी दोस्ती, अचानक सी, बेवक्त सी
जुड़ी हुई हो जैसे कलम और दवात सी
बिखरे पन्नों को सजाने वाली
शब्दों से मिली , एक सौगात सी।
कोई फूल खिला होगा,
बारिश की बूंदे बिखरी होंगी आसमान से,
ओस सिमट कर हरियाली में छुप गयी होगी,
या इंद्रधनुष सजा होगा विहान से,
तभी तो हम मिले, मिले बस आहट से,
हम जुड़े,जुड़े फिर चाहत से,
शब्दों को लय में सजाया ,
तूने मेरी,मैंने तेरी कविताओं को अपना बनाया,
तेरी मुस्कुराहट को , दुख को समझने लगी हूँ,
देखो न,, अब संग तुम्हारे संवरने लगी हूँ,
आंखों में काजल नहीं सपने सजाती हूँ,
एक बार हम मिल पाए, हर सुबह दोहराती हूँ,
दूर होकर भी डोर से जुड़े, जान ही नहीं पाए न
,,, हम कब इस राह पर मुड़े।
किसी ने दिया जलाया होगा,
नवशिशु मुस्कराया होगा माँ की गोद में,
कोई नया गीत सजा होगा किसी के लवों पर,
पंक्षी निकले होंगे दाने के लिए प्रमोद में,
कुछ तो खास हुआ होगा,
कोई दिल के पास हुआ होगा,
अपना है ये अहसास हुआ होगा,
जो हम पास हैं,,, दूर होकर भी।
🌺ताशु

गुल्लक

एक दो पांच के सिक्कों से भरी हुई, खनखनाहट के साथ,मिट्टी की खुशबू समेटे हुए,मेरी सारी बचपन की यादों की ,,, गुल्लक। 🌺 वो दादी से मिला एक सिक्का भागकर गुल्लक में छुपा देना, नाम लिख कर गुल्लक पर उसे कमरे में सजा देना, कागज के नोट से ज्यादा मुझे सिक्के पसंद थे, वो आसानी से गुल्लक में चले जाते थे, नोट को तोड़ मरोड़ कर डालना और उसमें भी फट जाता तो बड़ा गुस्सा आता। मिट्टी की गुल्लक,फूट तो जानी ही थी पर बहुत कुछ सिखा गयी,कैसे अपने से भारी समस्याओं को अपने अंदर संभाल कर रखते हैं, कैसे मुश्किल समय के लिए खुद को मजबूत बनाते हैं , कैसे टूट कर भी किसी के काम आते हैं।बचपन सिर्फ यादें नही एक किताब है जो सिखाता है बिना कहे बहुत कुछ,, सीखा ना गुल्लक से , पर परेशानियां जब टूटने को मजबूर कर दे तो भी उन अच्छे लम्हों को समेटकर परेशानी का हल खोजना चाहिए, गुल्लक टूटने पर भी हमें मुस्कराहट देकर जाती हैं ।🌺 ।।।।। गुल्लक ।।।।।🌺

गांव की यादें

सर्द शहर में याद हैं आती, सुलभ सुहानी गाँव की रातें ,
खेत की खुशबू ,नीम की छायाँ, दादी माँ की मीठी बातें,
कच्ची अमियाँ,मक्खन रोटी, आशीर्वादों की सौगातें,
आंखें नम हो जाती ,रिसती,भूली बिसरी गाँव की यादें।
बैलों की घण्टी की रुनझुन,मुनियाँ की पैरों की छुन छुन,
संध्या बन्दन कर सोते थे ,उठते कोयल की बोली सुन
चाय कहां माँ पीने देती,दूध दही और मक्खन खाते
आंखें नम हो जाती ,रिसती,भूली बिसरी गाँव की यादें।
शोर शराबे भाग दौड़ में,भाग रहे वृत्ति की होड़ में,
परिवारों का चलन है टूटा,सब खोया इस विरह जोड़ में
घुटता जीवन ,धुंध हुआ सब,गांव के पंछी लौटना चाहते
आंखें नम हो जाती ,रिसती,भूली बिसरी गाँव की यादें।

तू जाग तो सही,,,,

क्यों राख सी बुझी पड़ी , तू आग थी कहीं

तू थी धरा की कामना, विवाद थी कहीं

तू जीत लेगी दौड़ को, तू भाग तो सही

सुबह भी होगी आज पर तू जाग तो सही।

है काली रात चीखती, है आसमां भी सो गया

है रुक गए कदम तेरे, है धैर्य तेरा खो गया,

वो तुच्छ है जो देखता , तेरी सहमती शर्म को

वो पालता है दैत्य को , वो पोषता अधर्म को,

है वो गलत, बता उसे, विचार तो सही

शर्म को उसकी आंख से उतार तो सही

है तन तेरा भी मांस का , है तुझमे भी वो वेदना

उसे बता , तू भी है जन, वो बन्द करे तुझे भेदना,

क्यों भेद है शरीर का, मिले जवाब तो सही

सुबह भी होगी आज पर तू जाग तो सही

समझे ना

समझे ना

क्यूं छुपाती हूं अपने अहसास

क्यूं समझती हूं खुद को खास

क्यूं हर दिन बदल रहीं हूँ खुद को

क्यूं नासमझ सी रहती हूं

समझे ना

दीवारों से बातें करने लगी हुँ

अँधेरों से डरने लगी हुँ

चुप रहना खासियत थी मेरी

अब खुद से भी बातें करने लगी हुँ

समझे ना

तुम्हे समझने लगी हुँ।