नजरें हमसे वो चुराने लगे

ना जाना एक दूसरे को

फिर क्यूँ पहचान छुपाने लगे

आँखों में सच न मिला हमें

नजरें हमसे वो चुराने लगे

उनका चेहरा सूरज जैसा

उज्जवल , प्रकाशित किरण जैसा

छठा चाँद की ढलने लगी

आभा शीतलता में बदलने लगी

जलती सी ज्वाला राख हुई

अग्नि की पवित्रता नापाक हुई

हम समझे तिनका आँखों में

पर सच खुद ही वो दिखाने लगे

आँखों में सच न मिला हमें

नजरें हमसे वो चुराने लगे

क्यूँ छुपते हो नजरों से मेरी

हम खुद तुमको न जानते है

जो दिखता है आँखों में सच

हम सिर्फ उसीको मानते है

तुम नहीं हमारी मंजिल हो

लव्जों से तुम्हे बतलाने लगे

आँखों में सच न मिला हमें

नजरें हमसे वो चुराने लगे

 

 

कल हम आजाद हो जाएँगे

आजादी का चोला पहने हम, कर्म मार्ग पर बढ़ जाएँगे

हाथों में तिरंगा थाम के हम मन ही मन में मुस्काएंगे

कल हमको किसी ने बतलाया कि कल हम आजाद हो जाएँगे !

अब नहीं रहेंगे गुलामी में , एक सपना नया सजाएँगे

एक राष्ट्र थे अब तक हम , दो हिस्सों में बट जाएँगे

कल हमको किसी ने बतलाया कि कल हम आजाद हो जाएँगे !

आजाद हुए पर क्या कहना हम अपना राष्ट्र गवां बैठे

दो स्वार्थ भरे सपनों के लिए दो हिस्सों में कटवा बैठे

सीमा के आर पार रहकर एक दूजे को मरवाएंगे

कल हमको किसी ने बतलाया कि कल हम आजाद हो जाएँगे !

राजनीती सबसे ऊपर हम दो पाटों में पिसते है

अब किसको चुने किसको छोड़े बस यही विचारा करते है

खुद बढ़ न सके 10 से आगे वो देश को कहाँ बढाएँगे

कल हमको किसी ने बतलाया कि कल हम आजाद हो जाएँगे !

है वर्तमान अपना कैसा , कैसा भविष्य होगा अपना

शांति स्वतंत्रता की मूर्ति हो देश मेरा देखा सपना

मन में हमने यह ठान लिया हम निर्बल न रह पाएँगे

कल हमको किसी ने बतलाया कि कल हम आजाद हो जाएँगे !

बदलाव नया अब आया है , है वंशवाद मिटता दिखता

ये लोकतंत्र है भैया जी , जो है दिखता वो ही बिकता

संग कदम बढाया है हमने सबसे आगे बढ़ जाएँगे

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कल हमको किसी ने बतलाया कि कल हम आजाद हो जाएँगे !

 

 

 

 

एक डाल पर दो चिड़िया

एक डाल पर दो चिड़िया

दोनों उड़ना चाहती है, एक पंखों से

एक होसलों से

एक डाल पर दो चिड़िया

दोनों ही सीखना चाहतीं है  , एक उड़ना

एक उड़ान भरना

एक डाल पर दो चिड़िया

दोनों छूना चाहती है , एक मंजिल को

एक आसमां को

एक डाल पर दो चिड़िया

दोनों ही रहना चाहती है ,एक पेड़ पर

एक घोंसले में

एक चिड़िया जो पंखों से उड़कर ,अपनी मंजिल को पा चुकी है

दूसरी होसलों से उड़कर आसमां को छूना चाहती है , उसकी उड़ान बाकी है

उसके पंखों में जान बाकी है

 

 

प्यारा रिश्ता

6 अगस्त दोस्तों का दिन – friendship day

7 अगस्त भाई और बहन का दिवस — रक्षा बंधन

दोनों ही रिश्ते सुन्दर फूलों की खुशबू की तरह महकते रहे हैं

दोनों ही रिश्ते ईश्वर की अनमोल देन है

एक विश्वास का और और एक पवित्रता का रिश्ता है

रिश्तों के प्यार से सम्बंधित मेरी ये पंक्तियाँ ——

साथ पले है , साथ चले है

इक कश्ती पर साथ चढ़े है

जीवन की परिभाषा अलग भले पर दोनों रिश्ते साथ भले है

विश्वास , प्रेम और सहनशीलता दोनों रिश्तो को नए मायने देती है

आपस में नोक झोंक , टकराव दोनों ही रिश्तों में प्यार बढ़ा  देती है

समझते है एक दूसरे को पर गलतियों में साथ नहीं देना है

दोनों ही रिश्तों की नीव को पक्का कने का ये करीना है

चलो दोनों त्योहारों  को साथ मनाएं

सच्चे रिश्तों की दोनों परम्पराओं को निभाएं

 

तेरी गोद में माँ

माँ तेरी गोद में खेले है हम

रोकर हँसे और हँसते  हँसते  रो पड़े है हम

अपार शांति की खान है तू

अनुपम बेजोड़ और महान है तू

विचलित मन को शांति प्रदाता है तू

जीवन प्रदाती विधाता है तू

तेरा निर्माण इसलिए ही हुआ है

तू पवित्र अविरल दुआ है

आंखों को ठंडक और मन को स्थिरिता  दे

हें माँ मेरे विचारों को विस्तिरिता दे

हा हम तुझे नष्ट कर रहे

तेरी सुन्दरता को हर रोज हर रहे है

पर तू जननी जन्मदाता है

तू प्रकर्ती तू अन्नदाता है

फिर आँचल को समेट ले और बाहों को फेला ले

माँ में आ रही हूँ मुझे गोद में छुपा ले

अपनी गोद में

प्रकर्ती की गोद में !

 

में पानी की बूंद हूँ

पानी की बूँदें पारदर्शिता लिए हुए आसमां से धरती पर आ रहीं है , उन्हें नहीं पता कि उनका भविष्य क्या है वो जमीन में समा सकती है , सागर में मिलकर अपना अस्तित्व भी खो सकती है , नदियों में मिलकर किसी की प्यास भी बुझा सकती है !

इसी प्रकार भविष्य का निर्धारण आसमान से धरती के सफ़र के मध्य में ही हो जाता है

में पानी की बूंद हूँ , में भी आसमान से पारदर्शिता लिए हुए आयी थी , में जमीन में समा सकती हूँ , सागर रूपी दुनिया  में मिलकर अपना अस्तित्व खो सकती हूँ , नदियों की तरह जीवन की प्यास भुझा सकती हूँ !

मुझे मिट्टी में मत मिलाओ,   नहीं तो पानी की बूंद की तरह मुझमे भी  अशुध्दियों का समावेश हो जायेगा , मुझे अपनी हथेलियों में मत थामने की कोशिश करो,  सिर्फ  हाथ गीले रह जाएँगे , मुझे पवित्र रखो , पावन रखो मेरी पारदर्शिता को जीवित रखो में साफ़ दिखूंगी , में पानी की बूंद हूँ धरती की आवश्यकता हूँ !

 

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Relationship

relationship

# like a book

all question is based on it’s chapter and if we try , we were find out answers with satisfaction.

relationship

# like a house

it’s clarity is it’s beauty

relationship

# like a sea

it’s deepness is it’s specialty

relationship

# like a breath

we have no breath …. we have no life.

आंधियां

इक छोटा सा घर अपना है

पानी के बूंदे गिरती हैं ,  छत से वो नीचे रिसती हैं

वो जीवन सुधा हमारी  आँखों से बरसता  सपना है

इक छोटा सा घर अपना है

सर्दी की रात ठिठुरती हैं , अंगारे ढूँढा करती हैं

बैठ किनारे मंजिल के आशा की माला जपना है

इक छोटा सा घर अपना है

बस चाहत है उस आंधी की , जो इसे उडा कर ले जाए

रख दे सागर की धारा में , जो इसे बहा कर ले जाए

कठिनाई कैसी होती ये स्वाद इसे भी चखना है

इक छोटा सा घर अपना है !

 

कब मिलेंगे

दो दरिया के किनारे कब मिलेंगे

राहत के नज़ारे कब मिलेंगे

मिलें तों रख लेंगे छुपा के

पर वो चाहत के सितारे कब मिलेंगे ?

आसमां और धरती के सहारे कब मिलेंगे

सागर के किनारे कब मिलेंगे

मिलें तों रख लेंगे छुपा के

पर वो आँखों के इशारे कब मिलेंगे ?

दो देशों की मीनारें कब मिलेंगे

बहारों के नज़ारे कब मिलेंगे

मिलें तों रख लेंगे छुपा के

पर  साथी वो हमारे कब मिलेंगे ?