तू जाग तो सही

क्यों राख सी बुझी पड़ी , तू आग थी कहीं

तू थी धरा की कामना, विवाद थी कहीं

तू जीत लेगी दौड़ को, तू भाग तो सही

सुबह भी होगी आज पर तू जाग तो सही।

है काली रात चीखती, है आसमां भी सो गया

है रुक गए कदम तेरे, है धैर्य तेरा खो गया,

वो तुच्छ है जो देखता , तेरी सहमती शर्म को

वो पालता है दैत्य को , वो पोषता अधर्म को,

है वो गलत, बता उसे, विचार तो सही

शर्म को उसकी आंख से उतार तो सही

है तन तेरा भी मांस का , है तुझमे भी वो वेदना

उसे बता , तू भी है जन, वो बन्द करे तुझे भेदना,

क्यों भेद है शरीर का, मिले जवाब तो सही

सुबह भी होगी आज पर तू जाग तो सही

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हम भारत के लोग,,,,

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की और एकता अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प हो कर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई० “मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हज़ार छह विक्रमी) को एतद संविधान को अंगीकृत, अधिनियिमत और आत्मार्पित करते हैं.”

हम भारत के लोग,,,,,,,,,
हम भारत के लोग, अब भारत के नहीं रहे, सिर्फ खुद के बनकर रह गए है।अब हम निजवाद, धार्मिक भेदभाव , एक प्रभुत्व हीन, स्वार्थ के नीचे दवे देश की तस्वीर का निर्माण कर रहे है।

हम भारत के लोग चोरी , डकैती, भ्रष्टाचार , बलात्कार, कालाबाजारी , जमाखोरी, दलबाजी, गुटबंदी, आरोप प्रत्यारोप ,धार्मिक दंगे , ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों के कारण विकास और सदभावना जैसे शब्दों को भूलने पर मजबूर है।

हम भारत के लोग भूल गए है कि हम भारत के लोग है। हम सिर्फ रमेश, कासिम, सीता , हमीदा, सुखविंदर, एंथनी, है।( ये नाम किसी व्यक्ति विशेष को अंकित नहीं करते)

हम भारत के लोग , फिर से देशभक्ति को छोड़कर स्वार्थ भक्त हो रहे है, हम भारत के लोग,,,,,,

हे शारदे माँ

नव बसंत फिर से स्वर सुंदरता लिए हुए मुस्करा रहा है, हवा की सुगंध में रसायनों की गंध ने जगह बना ली है, पर बसंत खुश है,

मिट्टी की पवित्रता में कंकड़ों की चुभन है, पर बसंत खुश है

जीवन रूपी जल , जहर बनने वाला है पर बसंत खुश है

संगीत की मधुर ध्वनि कान फाडू रॉक हो गयी है पर बसंत खुश है

बसंत खुश है, इस आस में की अब में आया हूँ, कुछ नया ओर कुछ अच्छा होगा, हे शारदे माँ हवा की सुगंध, मिट्टी की पवित्रता, जल की शुद्धता, संगीत की मधुरता ओर मानव की मानवीयता को बचाए रखना, नव बसंत, जय माँ शारदे।

 ए देश मेरे ,क्या हुआ तुझे

ए देश मेरे क्या हुआ तुझे

कुछ बोल जरा क्यों शांत सा है

है हृदय हिमालय सहमा सा

इतिहास तेरा जीवांत सा है।

  क्यों उत्तर में  कश्मीर बना

 क्यों असम बनाया पूर्व में  

क्यों पश्चिम में गुजरात बना 

क्यों कर्नाटक है दक्षिण में

मैंने तो सुना तू भारत है 

 फिर बटा हुआ सीमांत सा है

 ए देश मेरे क्या हुआ तुझे

कुछ बोल जरा क्यों शांत सा है

है हृदय हिमालय सहमा सा

इतिहास तेरा जीवांत सा है।

क्यों फूल तेरे मुरझा से गये 

क्यों मिट्टी तेरी सूख रही

क्यों खेत तेरे पीले है पड़े

क्यों हवा में एक एकांत सा है

  ए देश मेरे क्या हुआ तुझे

कुछ बोल जरा क्यों शांत सा है

है हृदय हिमालय सहमा सा

इतिहास तेरा जीवांत सा है।

तेरे सपूत अब कहा गए 

क्या सोए तेरे रखवाले

अब नही है कोई भगतसिंह 

जो भरी सभा में बम डाले

काले अंग्रेजों ने  है घेरा 

तू इसीलिए मरणांत सा है

 ए देश मेरे क्या हुआ तुझे

कुछ बोल जरा क्यों शांत सा है

है हृदय हिमालय सहमा सा

इतिहास तेरा जीवांत सा है।